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कविता-हजार सूर्योदय वाली आवाज

वि.सं.२०७६ भदौ २१ शनिवार

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हजार सूर्योदय थे उसकी आवाज में
आसमान के सब तारों की चमक
दुनिया के सब चन्द्रमाओं की ठंढक थी उसमें
दिक्कत ये थी कि इतनी कम करता था बातें वो मुझसे
उन सब लोगों की बनिस्पत
जिनसे प्यार नहीं करता था
या कि कहता था कि प्यार नहीं करता था
करता था केवल मुझसे प्यार
या कि कहता था
समुद्र लरजता था उसकी इस बात में
या साथ साथ कई समुद्र लरजते थे
जैसे एक साथ
उसकी मेरी आँखों में
ये जलकुम्भी से भरे तालाब कैसे बन गए
उसके मेरे समुद्र
कहाँ गयीं वो नदियाँ
जो ताजा कर जाती थीं हमें
लिए जीवन का सहज प्रवाह
सतत प्रवाह ?
कहाँ गयीं नदिओं सी हमारी भी बातें ?
जबकि उसकी बातों में थे हजार सूर्योदय…


ठेगाना- Phase 3 , वी सी लेन, क्लब रोड, मुजफ्फरपुर बिहार भारत

वि.सं.२०७६ भदौ २१ शनिवार ०८:४८ मा प्रकाशित

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