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हिन्दी कविता: कोहरा

वि.सं.२०७७ मंसिर ६ शनिवार

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हर बार बांची जाती है
कोहरे की रति गाथा
जिसमे होती है
महर्षि पराशर और काली की कहानी

जिसे सुनकर
प्रेम बन के कोहरा
लिपटता है आगोश में

नर्म कोहरे में खोते
खुद से खुद को जोड़ते
धुंध में धुआं धुआं होते
अपने में जलते बुझते
रचते है प्रेमी प्रेम कहानी

लेकिन इससे इतर है
एक और कहानी

कोहरे की एक गाथा को
बांचता है मजदूर
सुलगती पेट की आग में
खुद को उसके ताप में
असल अंधकार में
कोहरे के प्रताप में

ओढ़ निकल पड़ता है
चादर कोहरे की
जमाता पांव पर थरथराता है
इससे पहले मौत सोख ले प्राण
भागता है पकड़ लेता है
कोहरे के पांव

अब मत कहना दुष्यंत
आसमानमें घना कोहरा है
ये उनकी व्यक्तिगत आलोचना है ।

वि.सं.२०७७ मंसिर ६ शनिवार ०९:४० मा प्रकाशित

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